अस्वीकरण (हिंदी)
यह कहानी पूर्णतः लेखक की मौलिक रचना है। इसमें वर्णित पात्र, घटनाएँ और संवाद लेखक की कल्पना पर आधारित हैं। यदि किसी जीवित या दिवंगत व्यक्ति, संस्था या घटना से कोई समानता प्रतीत होती है, तो उसे मात्र संयोग माना जाए।
भटकी हुई 'शिवाई' : पाकिस्तान की समुद्री सीमा में फँसे भारतीय मछुआरों की दर्दनाक कहानी..
🔗शापित गेस्ट हाउस इस गेस्ट हाउस में जाने की भूल कभी मत करना | एक सच्ची और रोंगटे खड़े कर देने वाली डरावनी कहानी..
पिछली कहानी भी ज़रूर पढ़ें...अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो हमारी पिछली दिल को छू लेने वाली कहानियाँ भी अवश्य पढ़ें। हर कहानी अपने साथ एक नया एहसास, एक नया अनुभव और जीवन का एक अनोखा संदेश लेकर आती है।भटकी हुई 'शिवाई' : पाकिस्तान की समुद्री सीमा में फँसे भारतीय मछुआरों की दर्शनाक कहानी..
भाग - 1
पालघर जिले के मोपणवारा गाँव की मछली पकड़ने वाली नाव "शिवाई" गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के लिए निकलती है। लेकिन अचानक उसका GPS खराब हो जाता है और नाव अनजाने में पाकिस्तान की समुद्री सीमा की ओर भटक जाती है। समुद्र, सीमाएँ, कैद और अपने वतन लौटने की उम्मीद पर आधारित यह एक रोमांचक और भावुक कहानी है।
भारतीय मछुआरों का जीवन समुद्र की लहरों जितना ही अनिश्चित और जोखिमों से भरा होता है। गहरे समुद्र में मछली पकड़ते समय मौसम, तकनीकी खराबी और समुद्री सीमाओं का थोड़ा-सा भी गलत अनुमान उनकी ज़िंदगी को खतरे में डाल सकता है। पालघर जिले के मोपणवारा गाँव की "शिवाई" नाव की यह कहानी ऐसे ही एक अनचाहे सफर की दास्तान है। GPS बंद हो जाने के कारण पाकिस्तान की समुद्री सीमा में पहुँचने के बाद शुरू होने वाला संघर्ष, कैद और अपने देश लौटने की आस पाठक को अंत तक बाँधे रखती है।
समुद्र सदियों से मनुष्य के लिए आकर्षण, आस्था और भय का विषय रहा है। दुनिया की अलग-अलग भाषाओं में समुद्र के अनेक नाम मिलते हैं, लेकिन उसके साथ इंसान का रिश्ता हर जगह एक जैसा है। मानव सभ्यता की शुरुआत से ही समुद्र किनारे रहने वाले लोगों का जीवन समुद्र की लहरों पर टिका रहा है। इसलिए वे समुद्र को केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि पालनहार, जीवनदाता और ईश्वर का रूप मानते आए हैं। आज भी अनेक तटीय समाज समुद्र को श्रद्धा से "दरियादेव" कहकर पुकारते हैं।
समुद्र ने मनुष्य को भोजन, व्यापार और आजीविका दी। मछलियाँ, नमक, सीप, मोती और समुद्री व्यापार ने मानव जीवन को समृद्ध बनाया। इन्हीं आवश्यकताओं ने मनुष्य को समुद्र से दोस्ती करना सिखाया। उसने तैरना सीखा, नावें बनाईं, जहाज़ बनाए और धीरे-धीरे समुद्री परिवहन तथा मछली पकड़ने का विकास हुआ।
मछली पकड़ने वाली नाव का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति "तांडेल" कहलाता है। वही नाव का कप्तान, मार्गदर्शक और अंतिम निर्णय लेने वाला होता है। उसे समुद्र, मौसम, धाराओं और संकटों का गहरा अनुभव होता है। उसके बाद सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति "सारंग" होता है। नाव पर जाल, माल, दिशा, अनुशासन और खलासियों की जिम्मेदारी वही संभालता है। समुद्र में तांडेल और सारंग का अनुभव ही पूरी नाव की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।
कोंकण तट पर सदियों से समुद्र से जुड़े अनेक समाज बसे हुए हैं। इनमें प्रमुख रूप से कोली समाज और उसकी विभिन्न उपजातियाँ, आगरी, गाबित, मुस्लिम दालदी समाज तथा ईसाई कोली समुदाय शामिल हैं। कुछ क्षेत्रों में भंडारी समाज के लोग भी मछली पकड़ने, नौकायन और समुद्री व्यापार से जुड़े रहे हैं।
मछली पकड़ना हो, समुद्री व्यापार हो या जहाज़ चलाना हो,इन सभी क्षेत्रों में तांडेल, सारंग और खलासियों का योगदान अमूल्य रहा है। समुद्र की ऊँची लहरों, भीषण तूफानों और अनिश्चित परिस्थितियों से लड़ते हुए उन्होंने अपनी मेहनत, साहस और अनुभव के बल पर समुद्री जीवन को जीवित रखा। यही कारण है कि समुद्र केवल पानी का विशाल भंडार नहीं, बल्कि कोंकण की संस्कृति, इतिहास और जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
नाव पर काम करने वाले लोगों का जीवन बेहद कठिन होता है। कई-कई दिनों तक उन्हें अपने परिवार से दूर रहना पड़ता है। तेज धूप, तूफानी हवाएँ, ऊँची लहरें, ठिठुरती रातें और लगातार डगमगाती नाव,यही उनका रोज़ का जीवन है। ऐसी परिस्थितियों में सोना, खाना और सामान्य दिनचर्या निभाना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता।
खलासी नाव का सबसे मेहनती और भरोसेमंद साथी होता है। तांडेल और सारंग जितने महत्वपूर्ण होते हैं, उतना ही महत्व खलासी के काम का भी होता है। नाव के अधिकांश काम वही संभालता है। समुद्र में हर पल मौत का खतरा मंडराता रहता है, फिर भी अपने परिवार का पेट पालने के लिए वे बिना किसी डर के समुद्र में उतर जाते हैं।
इन्हीं साहसी तांडेलों, सारंगों और खलासियों की बदौलत समुद्र और इंसान का रिश्ता पीढ़ियों से कायम है। यह कहानी भी ऐसे ही जाँबाज़ मछुआरों की है...
महाराष्ट्र के पालघर जिले के दहानू तालुका में समुद्र किनारे बसा एक छोटा-सा गाँव था.मोपणवारा। गाँव की अधिकांश आबादी मछुआरों की थी। समुद्र, नावें, जाल और मछलियों की महक ही वहाँ के लोगों का जीवन थी। ऐसा लगता था मानो उस गाँव की रगों में खून नहीं, समुद्र की लहरें बहती हों।
रात का अँधेरा धीरे-धीरे छँट रहा था। पूरब का आसमान हल्की लालिमा से रंगने लगा था। सूरज की पहली किरणें अभी धरती पर नहीं पहुँची थीं, लेकिन सुबह होने की आहट साफ महसूस हो रही थी। आसमान में शुक्र तारा चमक रहा था और उसके पास पतली-सी चाँद की कली किसी चित्रकार की बनाई रेखा जैसी दिखाई दे रही थी।
समुद्र किनारे खड़े नारियल और ताड़ के पेड़ ठंडी समुद्री हवा में झूम रहे थे। कुछ पेड़ समुद्र की ओर झुके हुए लग रहे थे, तो कुछ हवा के तेज झोंकों के सामने डटे हुए थे।
कुछ ही देर बाद सूरज की सुनहरी किरणों ने पूरे मोपणवारा तट को रोशन कर दिया। समुद्र की लहरें पिघले हुए सोने की तरह चमकने लगीं। किनारे बँधी नावें लहरों के साथ धीरे-धीरे हिल रही थीं।
गाँव में हलचल शुरू हो चुकी थी। कोई जाल की मरम्मत कर रहा था, कोई डीज़ल के डिब्बे नाव में रख रहा था, तो कोई बर्फ की सिल्लियाँ चढ़ा रहा था। महिलाएँ भी पीछे नहीं थीं। कोई अपने पति को गर्म चाय पकड़ा रही थी, तो कोई घर के मंदिर में नारियल चढ़ाकर उनकी सकुशल वापसी की प्रार्थना कर रही थी।
यहीं से शुरू होती है "शिवाई" और उसके तांडेल ‘मनोहर’ की वह यात्रा, जो उन्हें मछलियों की तलाश में नहीं, बल्कि इतिहास के सबसे दर्दनाक समुद्री अनुभवों में से एक की ओर ले जाने वाली थी...
भाग - 2
सूरज अब पूरी तरह निकल चुका था। सभी मछुआरे अपने-अपने काम में लग गए थे, लेकिन मनोहर उर्फ मन्या तांडेल के चेहरे पर संतोष नहीं था। कई दिनों से जाल में उम्मीद के मुताबिक मछलियाँ नहीं मिल रही थीं। डीज़ल का खर्च, बर्फ, जाल की मरम्मत, नाव के साझेदारों का हिस्सा और खलासियों की मजदूरी निकालना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा था। कमाई घट रही थी और खर्च लगातार बढ़ रहा था।
आख़िरकार उसने फैसला किया कि इस बार नाव को गहरे समुद्र में ले जाया जाएगा। गहरे समुद्र का मतलब था ज़्यादा जोखिम, ज़्यादा खर्च और जान का कोई भरोसा नहीं। लेकिन वहीं अच्छी मछलियाँ मिलने की संभावना भी सबसे अधिक थी।
छोटे मछुआरों की परेशानी का एक और कारण था बड़ी पर्स-सीन (Purse Seine) नौकाएँ। उनके विशाल जाल समुद्र से इतनी बड़ी मात्रा में मछलियाँ निकाल लेते थे कि पारंपरिक मछुआरों के हिस्से में बहुत कम मछलियाँ बचती थीं। नियम होने के बावजूद इन बड़ी नावों पर किसी का नियंत्रण नहीं था। इसका सबसे बड़ा नुकसान छोटे मछुआरों को उठाना पड़ रहा था।
मन्या कुछ देर तक समुद्र की ओर देखता रहा। उसकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी। वह अच्छी तरह जानता था कि समुद्र कभी माँ की तरह दुलार देता है, तो कभी पल भर में सब कुछ छीन भी लेता है।
नाव को समुद्र में उतारने से पहले उसने परंपरा के अनुसार नारियल चढ़ाया। दोनों हाथ जोड़कर उसने मन ही मन प्रार्थना की,
"दरियादेव…इस बार भी हमें सुरक्षित वापस घर पहुँचा देना।"
सभी मछुआरों ने श्रद्धा से सिर झुका दिया।
इधर किनारे पर खड़ी दूसरी नावों के इंजन भी एक-एक करके गरजने लगे। खलासी रस्सियाँ खोल रहे थे। जाल ठीक किए जा रहे थे। हर तरफ़ भाग-दौड़ और उत्साह का माहौल था।
तभी चारों ओर एक साथ आवाज़ गूँजी,
"हैय्या... हो... हैय्या... हो..."
यह आवाज़ सिर्फ़ एक पुकार नहीं थी, बल्कि समुद्र से दो-दो हाथ करने का साहस थी।
कुछ ही देर में एक-एक करके सभी नावें लहरों को चीरती हुई गहरे समुद्र की ओर बढ़ने लगीं।
आज "शिवाई" को दूर समुद्र में जाना था। इसलिए मन्या तांडेल, गणू सारंग और बाकी खलासियों के परिवार उन्हें विदा करने बंदरगाह तक आए थे।
किसी के हाथ में नारियल था, किसी ने आरती की थाली सजाई थी। बूढ़ी माँएँ भगवान का नाम जप रही थीं। छोटे-छोटे बच्चे अपने पिता का हाथ छोड़ना ही नहीं चाहते थे।
जैसे ही इंजन ने रफ्तार पकड़ी, किनारे पर खड़ी महिलाओं की आँखें भर आईं। किसी ने आँचल से आँसू पोंछे, तो किसी ने हाथ जोड़कर समुद्र की ओर देखा।
नाव धीरे-धीरे किनारे से दूर होती गई।
किनारे पर खड़े लोगों के हाथ बहुत देर तक हवा में लहराते रहे, जबकि "शिवाई" समुद्र के विशाल विस्तार में एक छोटे-से बिंदु की तरह दिखाई देने लगी।
समुद्र पर जाने वाले हर मछुआरे की विदाई के पीछे एक ही डर छिपा होता हैI
"क्या वह वापस लौटेगा?"
अनुकूल हवा चल रही थी। इसलिए कम डीज़ल में ज़्यादा दूरी तय की जा सकती थी। मन्या ने इंजन की रफ्तार बढ़ा दी।
कुछ देर बाद उन्होंने पहला जाल समुद्र में डाल दिया। सभी की निगाहें उसी पर टिकी थीं। उम्मीद थी कि इस बार किस्मत साथ देगी।
दोपहर होते-होते सूरज की तपिश बढ़ गई। कुछ खलासी व्हील हाउस में जाकर बैठ गए, तो कुछ डेक पर ही लेटकर आराम करने लगे।
शाम ढलने लगी तो समुद्र की ठंडी हवा ने फिर से सभी को ताज़गी से भर दिया।
डेक पर स्टोव जलाया गया। काले पड़ चुके एल्युमिनियम के बर्तन में कड़क चाय उबलने लगी। समुद्र के बीचों-बीच वह गर्म चाय थके हुए शरीर में नई जान डाल रही थी।
चाय पीने के बाद कुछ लोगों ने पान लगाया, कुछ ने तंबाकू मलकर मुँह में दबाई, तो कुछ बीड़ी सुलगाने लगे।
लेकिन मन्या तांडेल इनमें से कुछ भी नहीं करता था। उसकी बस एक आदत थी,रात को थकान मिटाने के लिए थोड़ा-सा देसी शराब पी लेना।
धीरे-धीरे रात उतर आई।
खलासियों ने छोटे जाल से मिली ताज़ी मछलियों का स्वादिष्ट झोल बनाया। गरम भात और तली हुई झींगा मछली के साथ सबने भरपेट खाना खाया।
खाना खत्म होने के बाद मन्या ने साथियों की ओर देखते हुए कहा,
"सुबह से GPS बंद पड़ा है... खाना हो गया है तो पहले उसे ठीक करके देखते हैं।"
एक खलासी बोला,
"हाँ मन्या भाऊ... पहले वही देख लेते हैं।"
मन्या ने GPS का बटन दबाया।
एक बार...
दो बार...
तीन बार...
लेकिन स्क्रीन बिल्कुल काली रही।
उसके माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होने लगीं।
गहरे समुद्र में GPS सिर्फ़ एक मशीन नहीं होता, बल्कि नाव की आँख होता है।
उसने एक बार फिर कोशिश की।
इस बार अचानक स्क्रीन जगमगा उठी।
GPS चालू हो गया था।
कुछ पल के लिए मन्या ने राहत की साँस ली।
लेकिन अगले ही क्षण स्क्रीन पर दिखाई दे रहे निर्देशांक (Coordinates) देखते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
उसके हाथ काँपने लगे।
गला सूख गया।
GPS बता रहा था कि "शिवाई" दिनभर दिशा भटकते-भटकते भारत की समुद्री सीमा पार कर पाकिस्तान के समुद्री क्षेत्र के बेहद करीब पहुँच चुकी थी...
उसी समय वायरलेस सेट पर टूटी-फूटी आवाज़ सुनाई दी,
"...कराची पोर्ट..."
इसके बाद उर्दू में कुछ बातचीत सुनाई देने लगी।
इतना सुनते ही मन्या के शरीर से जैसे शराब का सारा नशा पलभर में उतर गया।
उसने घबराकर फिर GPS देखा।
अब उसे पूरी तरह यक़ीन हो चुका था...
वे रास्ता भटक चुके थे।
और शायद...
अब बहुत देर हो चुकी थी...
भाग - 3
रात गहराती जा रही थी। चारों तरफ़ अथाह समुद्र और सन्नाटा पसरा हुआ था। केवल लहरों की आवाज़ और इंजन की धीमी गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी।
मन्या तांडेल ने घबराकर सभी खलासियों को अपने पास बुलाया।
उसने धीमी आवाज़ में कहा,
"GPS बंद होने की वजह से हमारी नाव रास्ता भटक गई है। लगता है हम पाकिस्तान की समुद्री सीमा में पहुँच चुके हैं। अब ज़रा भी लापरवाही हमारी जान पर भारी पड़ सकती है।"
यह सुनते ही सभी के चेहरों का रंग उड़ गया। कुछ क्षण पहले तक जो लोग हँस-बोल रहे थे, वे अब खामोश हो गए। किसी ने समुद्र की ओर देखा, तो किसी ने आसमान की ओर। हर चेहरे पर सिर्फ़ डर दिखाई दे रहा था।
इसी बीच दूर समुद्र में दिखाई दे रही हल्की-सी रोशनी तेज़ी से उनकी ओर बढ़ने लगी।
जैसे-जैसे वह रोशनी पास आती गई, "शिवाई" पर सन्नाटा और गहरा होता गया।
अचानक सामने से एक बेहद तेज़ सर्चलाइट उनकी नाव पर पड़ी।
इतनी तेज़ रोशनी थी कि कुछ पल के लिए किसी की आँखें खुली नहीं रह सकीं। सबने हाथों से अपनी आँखें ढँक लीं।
जब रोशनी थोड़ी स्थिर हुई तो मन्या ने सामने देखने की कोशिश की।
सफ़ेद रंग का एक बड़ा जहाज़ उनकी नाव के बिल्कुल पास आ चुका था।
उस पर हरे रंग के बड़े अक्षरों में लिखा था
"Pakistan Maritime Security Agency"
ये शब्द पढ़ते ही मन्या के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
अब किसी शक की गुंजाइश नहीं थी।
वे पाकिस्तान की समुद्री सुरक्षा एजेंसी के कब्ज़े में आ चुके थे।
उधर से उर्दू में तेज़ आवाज़ें सुनाई देने लगीं।
कुछ ही क्षण बाद हथियारों से लैस सैनिक बोर्डिंग सीढ़ी के सहारे "शिवाई" पर चढ़ आए।
उनकी राइफ़लों की नाल सीधे भारतीय मछुआरों की ओर तनी हुई थी।
एक अधिकारी ने ज़ोर से आदेश दिया,
"हैंड्स अप!"
सभी खलासियों ने बिना एक शब्द बोले अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए।
सैनिकों ने एक-एक व्यक्ति की तलाशी ली।
इसके बाद नाव के हर हिस्से की बारीकी से जाँच शुरू हुई। जाल, डीज़ल के ड्रम, बर्फ़ का स्टोर, मछलियों का होल्ड और तांडेल का केबिन सब कुछ खंगाल डाला गया।
लेकिन उन्हें कोई संदिग्ध सामान नहीं मिला।
इसी दौरान एक अधिकारी ने समुद्र में डाले गए बड़े जाल को ऊपर खींचने का आदेश दिया।
खलासी काँपते हुए जाल खींचने लगे।
जाल इतना भारी था कि पाँच-छह लोग मिलकर भी उसे आसानी से ऊपर नहीं ला पा रहे थे।
कड़ी मशक्कत के बाद जब पूरा जाल डेक पर आया तो हर कोई कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गया।
जाल में बड़ी-बड़ी पापलेट, सुरमई, झींगे, हलवा मछलियाँ और कई अन्य समुद्री मछलियाँ तड़प रही थीं।
इतनी बड़ी पकड़ शायद "शिवाई" को पहले कभी नहीं मिली थी।
लेकिन उस समय किसी के चेहरे पर खुशी नहीं थी।
जिस मछली के लिए वे समुद्र में आए थे, वही अब उनके किसी काम की नहीं रह गई थी।
सैनिकों ने सारी मछलियाँ वापस बर्फ़ वाले होल्ड में भरवा दीं।
फिर मन्या को आदेश मिला,
"अपनी नाव हमारे जहाज़ के पीछे चलाओ।"
नौ सैनिक बंदूकें ताने पूरी यात्रा के दौरान भारतीय मछुआरों पर नज़र रखे रहे।
अब "शिवाई" कोई मछली पकड़ने वाली नाव नहीं रही थी।
वह एक कैदी की तरह पाकिस्तान के जहाज़ के पीछे-पीछे चल रही थी।
करीब डेढ़ घंटे बाद दूर-दूर तक फैली रोशनियाँ दिखाई देने लगीं।
कुछ ही देर में वे कराची बंदरगाह पहुँच गए।
बंदरगाह पर पहले से सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी थी।
"शिवाई" को ज़ब्त कर लिया गया।
सभी भारतीय मछुआरों को नीचे उतारकर एक बड़े हॉल में ले जाया गया।
उन्हें घुटनों के बल बैठने का आदेश दिया गया।
डरे हुए मछुआरे चुपचाप बैठे रहे।
तभी कैमरों की फ्लैश लगातार चमकने लगीं।
पत्रकार उनकी तस्वीरें लेने लगे।
एक पाकिस्तानी अधिकारी उर्दू में मीडिया को जानकारी दे रहा था।
मन्या और उसके साथी किसी अपराधी की तरह कैमरों के सामने बैठे थे।
लेकिन उनके मन में सिर्फ़ एक सवाल था,
"अब हमारे साथ क्या होगा?"
भाग - 4 (समापन)
पूछताछ और मीडिया की हलचल खत्म होते ही सैनिकों ने सभी भारतीय मछुआरों के सिर पर काले रंग के मोटे कपड़े की थैलियाँ चढ़ा दीं।
अब किसी को यह भी पता नहीं था कि उन्हें कहाँ ले जाया जा रहा है।
चारों ओर सिर्फ़ कदमों की आवाज़ें, उर्दू में दिए जा रहे आदेश और भारी लोहे के दरवाज़ों के खुलने-बंद होने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
कुछ देर बाद उन्हें एक वाहन में बैठाया गया।
किसी के मन में डर था, किसी के मन में परिवार की चिंता। कोई चुपचाप भगवान को याद कर रहा था, तो कोई अपनी आँखों के आँसू रोकने की कोशिश कर रहा था।
काफ़ी देर बाद जब उनके सिर से काली थैलियाँ हटाई गईं, तो सामने का दृश्य देखकर सब सन्न रह गए।
वे एक जेल के भीतर थे।
ऊँची दीवारें...
लोहे की मोटी सलाखें...
सीलन से भरी कोठरियाँ...
और बाहर बंदूकें लिए पहरा देते सुरक्षाकर्मी।
कुछ ही घंटों में उन्हें समझ आ गया कि अब उनकी दुनिया यही चार दीवारें हैं।
बाद में पूछताछ के दौरान पता चला कि GPS बंद हो जाने के कारण "शिवाई" भटकते-भटकते सर क्रीक (Sir Creek) के विवादित समुद्री क्षेत्र तक पहुँच गई थी।
समुद्र में कहीं भी कोई दिखाई देने वाली सीमा नहीं होती।
यही वजह है कि हर साल कई भारतीय और पाकिस्तानी मछुआरे अनजाने में एक-दूसरे की समुद्री सीमा में प्रवेश कर जाते हैं।
लेकिन सीमा पार करते ही वे कानून की गिरफ्त में आ जाते हैं।
कई भारतीय मछुआरे वर्षों तक पाकिस्तान की जेलों में बंद रहते हैं।
कुछ लोग दो-दो, तीन-तीन साल बाद अपने देश लौट पाते हैं।
कुछ इतने बीमार हो जाते हैं कि उनका इलाज भी ठीक से नहीं हो पाता।
और कई ऐसे भी होते हैं, जो कभी अपने घर वापस नहीं लौटते।
उनके परिवारों को सिर्फ़ उनकी मौत की खबर मिलती है।
समय बीतता गया।
दिन...
हफ़्ते...
महीने...
जेल की सलाखों के पीछे हर दिन एक जैसा लगता था।
सुबह गिनती...
पूछताछ...
सादा खाना...
और फिर लंबी खामोशी।
मन्या तांडेल अक्सर रात को जेल की छोटी-सी खिड़की से आसमान को देखा करता था।
उसे लगता, वही आसमान मोपणवारा गाँव के ऊपर भी फैला होगा।
उसे अपनी पत्नी की भीगी आँखें याद आतीं।
बच्चों की मासूम मुस्कान याद आती।
समुद्र किनारे विदा करते समय हवा में लहराते उनके हाथ याद आते।
हर रात उसकी आँखें नम हो जातीं।
लेकिन उसने उम्मीद नहीं छोड़ी।
वह अपने साथियों से हमेशा एक ही बात कहता,
"दरिया ने हमें यहाँ तक पहुँचाया है... वही एक दिन हमें अपने वतन भी वापस ले जाएगा।"
इधर भारत और पाकिस्तान के बीच बंदी मछुआरों की रिहाई को लेकर राजनयिक बातचीत शुरू हुई।
कई महीनों बाद एक सुबह जेल परिसर में कैदियों के नाम पुकारे जाने लगे।
हर नाम के साथ किसी की धड़कन तेज़ हो जाती।
अचानक आवाज़ आई,
"मनोहर उर्फ़ मन्या तांडेल..."
कुछ पल के लिए मन्या को विश्वास ही नहीं हुआ।
जब अधिकारी ने दोबारा उसका नाम पुकारा, तब उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
आख़िरकार वह दिन आ ही गया, जिसका उसे महीनों से इंतज़ार था।
औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद भारतीय मछुआरों को सीमा तक लाया गया।
जैसे ही उन्होंने भारत की धरती पर कदम रखा, मन्या कुछ पल के लिए वहीं रुक गया।
वह झुककर अपनी मातृभूमि की मिट्टी उठाई।
उसने उस मिट्टी को अपने माथे से लगाया और उसकी आँखें भर आईं।
उस क्षण उसे लगा जैसे समुद्र ने आखिरकार अपना वादा निभा दिया हो।
उसके सामने फिर वही मोपणवारा का किनारा था...
लहरों की आवाज़ थी...
अपने लोगों का अपनापन था...
और सबसे बढ़कर...
अपने देश की मिट्टी की खुशबू थी।
समापन
समुद्र किसी का नहीं होता, लेकिन उस पर खींची गई अदृश्य सीमाएँ कई बेगुनाह मछुआरों की ज़िंदगी बदल देती हैं।
वे न सैनिक होते हैं, न जासूस।
वे केवल अपने परिवार की रोज़ी-रोटी के लिए समुद्र में उतरने वाले मेहनतकश लोग होते हैं।
एक तकनीकी खराबी, मौसम की एक भूल या दिशा का एक छोटा-सा भ्रम उन्हें वर्षों की कैद और अपनों से बिछड़ने की सज़ा दे सकता है।
"भटकी हुई 'शिवाई'" सिर्फ़ एक नाव की कहानी नहीं, बल्कि उन हज़ारों भारतीय मछुआरों के संघर्ष, दर्द, उम्मीद और मातृभूमि से अटूट प्रेम की कहानी है, जो हर बार समुद्र में उतरते समय यही प्रार्थना करते हैं|
"हे दरियादेव... हमें सकुशल वापस अपने घर पहुँचा देना।"
समाप्त..🖋️📚📖
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