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शापित गेस्ट हाउस इस गेस्ट हाउस में जाने की भूल कभी मत करना | एक सच्ची और रोंगटे खड़े कर देने वाली डरावनी कहानी..

अस्वीकरण (हिंदी)

यह कहानी पूर्णतः लेखक की मौलिक रचना है। इसमें वर्णित पात्र, घटनाएँ और संवाद लेखक की कल्पना पर आधारित हैं। यदि किसी जीवित या दिवंगत व्यक्ति, संस्था या घटना से कोई समानता प्रतीत होती है, तो उसे मात्र संयोग माना जाए।

 शापित गेस्ट हाउस  इस गेस्ट हाउस में जाने की भूल कभी मत करना | एक सच्ची और रोंगटे खड़े कर देने वाली डरावनी कहानी..

शापित गेस्ट हाउस की डरावनी रात, बारिश में खड़ा एक भूतिया गेस्ट हाउस, तीन पुरातत्व विशेषज्ञ, रहस्यमयी केयरटेकर और अमावस्या की भयावह चीख पर आधारित हॉरर कहानी।

पिछली कहानी भी ज़रूर पढ़ें...अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो हमारी पिछली दिल को छू लेने वाली कहानियाँ भी अवश्य पढ़ें। हर कहानी अपने साथ एक नया एहसास, एक नया अनुभव और जीवन का एक अनोखा संदेश लेकर आती है।
शापित गेस्ट हाउस  इस गेस्ट हाउस में जाने की भूल कभी मत करना | एक सच्ची और रोंगटे खड़े कर देने वाली डरावनी कहानी..

'शापित गेस्ट हाउस' एक रोमांचक हिंदी हॉरर कहानी है, जिसमें तीन रेस्क्यू आर्कियोलॉजिस्ट एक सुनसान गेस्ट हाउस में ठहरते हैं। अमावस्या की रात वहाँ गूँजने वाली रहस्यमयी चीख, एक अभिशप्त केयरटेकर और डरावने रहस्यों से भरी यह कहानी आपको आख़िर तक बाँधे रखेगी। अगर आपको Haunted Guest House, Ghost Stories, Paranormal Horror और Mystery Thriller पसंद हैं, तो यह कहानी ज़रूर पढ़ें।

एक बरसाती रात का ऐसा अनुभव, जिसने तीन लोगों की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी। कहते हैं कि उस सुनसान गेस्ट हाउस में कोई अनजानी शक्ति रहती थी। क्या वह सिर्फ़ एक अफ़वाह थी या सचमुच वहाँ कुछ ऐसा था जिसे इंसानी आँखें देख नहीं सकती थीं?

अगर आपको रहस्य, रोमांच और डर से भरी कहानियाँ पसंद हैं, तो यह कहानी आपको आख़िरी पंक्ति तक बाँधे रखेगी।

भाग - 1)  इस गेस्ट हाउस में जाने की भूल कभी मत करना..

मानव सभ्यता का इतिहास केवल किताबों में ही दर्ज नहीं है। वह पुराने खंडहरों, प्राचीन इमारतों, शिलालेखों और ज़मीन के नीचे दफ़्न अनगिनत अवशेषों में भी छिपा हुआ है। इन्हीं सबका अध्ययन करके हमारे अतीत की जीवनशैली, संस्कृति और विकास को समझने वाले विज्ञान को पुरातत्व (Archaeology) कहा जाता है।

भारत जैसे प्राचीन और समृद्ध इतिहास वाले देश में पुरातत्व विभाग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसका मुख्य काम ज़मीन के भीतर छिपे ऐतिहासिक प्रमाणों की खोज करना है। वैज्ञानिक तरीकों से खुदाई करके प्राचीन वस्तुएँ और संरचनाएँ निकाली जाती हैं, ताकि इतिहास की अमूल्य धरोहर सुरक्षित रह सके।

इसी से जुड़ी एक महत्वपूर्ण शाखा है रेस्क्यू आर्कियोलॉजी (Rescue Archaeology)। जब किसी सड़क, बाँध, मेट्रो लाइन या बड़े निर्माण कार्य की वजह से कोई पुरातात्विक स्थल नष्ट होने की आशंका होती है, तब समय रहते उसका अध्ययन और संरक्षण किया जाता है। सीमित समय में बेहद सावधानी से किया जाने वाला यह कार्य हमारे सांस्कृतिक इतिहास को बचाने का अंतिम अवसर होता है।

इसी तरह आंध्र प्रदेश के पोलावरम बाँध परियोजना में तीन निजी संस्था के रेस्क्यू आर्कियोलॉजिस्ट-रामेश्वर, अमोल और पंचम -काम कर रहे थे।

पूरा दिन खुदाई का काम करने के बाद शाम को वे पास के एक गेस्ट हाउस की ओर निकल पड़े।

तभी वहाँ काम करने वाले कुछ स्थानीय मज़दूर उनके पास आए। उनके चेहरों पर घबराहट साफ़ दिखाई दे रही थी।

एक बुज़ुर्ग मज़दूर हिचकिचाते हुए बोला,

"साहब.. अगर हो सके तो किसी दूसरे गेस्ट हाउस में ठहर जाइए। नहीं तो हमारे घर चलिए, हमें कोई दिक्कत नहीं होगी। आपका काम यहाँ अभी बीस दिनों से भी ज़्यादा चलेगा... लेकिन जिस गेस्ट हाउस में आप रहने जा रहे हैं... वह ठीक जगह नहीं है। लोग कहते हैं कि वह शापित है।"

उसकी आवाज़ में डर साफ़ झलक रहा था।

तीनों कुछ पल के लिए चुप रह गए।

क्या यह सिर्फ़ गाँव वालों की अंधविश्वासी बात थी... या सचमुच उस गेस्ट हाउस में कोई भयानक रहस्य छिपा था?

अगले ही पल तीनों एक-दूसरे का चेहरा देखकर ज़ोर से हँस पड़े।

तनाव भरा माहौल अचानक हल्का हो गया।

पंचम मुस्कुराते हुए आगे बढ़ा और बोला,

"भाई, हमारा काम ही ऐसा है। जहाँ तुम मिट्टी खोदते हो, वहीं हमें इंसानों के कंकाल, हड्डियाँ और सदियों पुराने अवशेष मिलते हैं। उनकी जाँच भी हमें ही करनी पड़ती है।

उजड़े महल, खंडहर, वीरान किले और लोगों के मुताबिक़ भूतिया जगहों पर हम रोज़ काम करते हैं। कई बार तो पूरी रात वहीं बितानी पड़ती है। आज तक हमारा बाल भी बाँका नहीं हुआ... तो अब क्या हो जाएगा?"

उसने मज़दूरों की तरफ़ मुस्कुराकर देखा, जैसे उनकी बात को मज़ाक समझ रहा हो।

लेकिन मज़दूर नहीं हँसे।

वे चुपचाप खड़े रहे।

उनके चेहरों पर सिर्फ़ एक अजीब-सा डर था... जैसे वे कुछ ऐसा जानते हों, जो ये तीनों नहीं जानते थे।

कुछ देर बाद परियोजना की जीप उन्हें लेकर गेस्ट हाउस की ओर निकल पड़ी।

वह जगह लगभग नौ-दस किलोमीटर दूर थी।

शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी। डूबते सूरज ने आसमान को केसरिया, बैंगनी और नीले रंगों से इस तरह रंग दिया था, मानो किसी कलाकार ने कैनवास पर अपनी आख़िरी कूची चलाई हो।

दृश्य बेहद खूबसूरत था...

लेकिन उस खूबसूरती के पीछे कहीं न कहीं एक अनजाना डर छिपा हुआ महसूस हो रहा था।

धीरे-धीरे अँधेरा पूरे जंगल पर अपना साम्राज्य फैलाने लगा।

जीप लगातार आगे बढ़ रही थी।

हर बीतते किलोमीटर के साथ वातावरण और भी ज़्यादा शांत...और रहस्यमय होता जा रहा था।

अब साफ़ दिखाई देने लगा था कि सड़क किसी आबादी की ओर नहीं, बल्कि घने जंगल के भीतर जा रही है।

चारों तरफ़ सिर्फ़ पेड़...

उनकी परछाइयाँ...

और एक अजीब-सी ख़ामोशी।

हालाँकि ऐसी जगहों पर काम करना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी। उनके पेशे की यही माँग थी कि जहाँ इंसानों के होने का कोई निशान न मिले, वहीं उन्हें दिन-रात काम करना पड़ता था।

तभी हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई।

शुरुआत में बारिश फुसफुसाहट जैसी थी, लेकिन देखते ही देखते वह तेज़ हो गई।

खुली जीप में बारिश की बूँदें अंदर आने लगीं।

चेहरे पर पड़ती ठंडी बूँदें जैसे कोई अनजाना संदेश लेकर आई हों।

बारिश बढ़ने पर ड्राइवर ने जीप के साइड कर्टन नीचे कर दिए।

बाहर का नज़ारा धुँधला पड़ गया।

अब जीप के भीतर एक अजीब-सी बंद और घुटनभरी ख़ामोशी थी...

और किसी को नहीं पता था कि आगे उनका इंतज़ार क्या कर रहा था...

भाग- 2) वीरान गेस्ट हाउस और आधी रात से पहले का सन्नाटा..

बारिश अब मूसलाधार हो चुकी थी। विंडशील्ड पर गिरती तेज़ बूँदों को वाइपर लगातार हटाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनकी रफ़्तार भी बारिश के सामने बेबस लग रही थी। हेडलाइट की हल्की रोशनी में सड़क बस धुँधली-सी दिखाई दे रही थी, मानो अँधेरे ने उसे निगल लिया हो।

ड्राइवर ने धीरे-धीरे तेलुगु गाने चला दिए। उन धुनों में न जाने क्यों एक अजीब-सी उदासी और बेचैनी घुली हुई थी।

जीप के भीतर बैठे तीनों अब बिल्कुल चुप थे।

किसी के होंठ नहीं हिल रहे थे, लेकिन हर किसी के मन में एक ही सवाल था...

"आख़िर हम जा कहाँ रहे हैं?"

अचानक वाइपर ने शीशा साफ़ किया और सामने एक लंबी, एक मंज़िला इमारत दिखाई दी।

उस इमारत के चारों ओर घना अँधेरा पसरा था। बस कुछ पीली, मद्धम रोशनियाँ उसके अस्तित्व का एहसास करा रही थीं। तेज़ बारिश के बीच वह गेस्ट हाउस किसी भूतिया परछाईं की तरह दिखाई दे रहा था।

ड्राइवर ने धीरे से कहा,

"साहब... यही है वो गेस्ट हाउस। लेकिन सच बताऊँ... अभी भी चाहें तो मैं आपको किसी और जगह छोड़ सकता हूँ।"

तीनों ने उसकी तरफ़ देखा।

वह आगे बोला,

"आज अमावस्या है...और इस जगह के बारे में मैंने बहुत अजीब बातें सुनी हैं। दूसरा गेस्ट हाउस यहाँ से करीब दो घंटे दूर है। अगर कहें तो मैं अभी लेकर चलता हूँ।"

कुछ पल के लिए जीप के भीतर सन्नाटा छा गया।

फिर तीनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और एक साथ जवाब दिया,

"नहीं..."

बाहर तेज़ बारिश हो रही थी और सबसे बड़ी बात, उन्हें भूत-प्रेत जैसी किसी चीज़ पर विश्वास नहीं था।

वे जीप से नीचे उतर गए।

उतरते ही रामेश्वर के कान में लगा हियरिंग एड फिसलकर पानी में गिर पड़ा।

वह घबरा गया।

जल्दी से उसने उसे उठाया, लेकिन तब तक वह पूरी तरह भीग चुका था।

रामेश्वर पहले से ही कम सुन पाता था। अब हियरिंग एड भी बंद हो चुका था।

उसने उसे रूमाल से पोंछा, जेब में रखा और चुपचाप आगे बढ़ गया।

ड्राइवर बोला,

"साहब, आप लोग चेक-इन कर लें... तब तक मैं यहीं रुकता हूँ।"

तीनों ने सिर हिलाकर हामी भर दी।

गाड़ी पोर्च के नीचे खड़ी थी, इसलिए वे भीगे बिना अंदर पहुँच गए।

गेस्ट हाउस के अंदर कदम रखते ही उन्हें एक अजीब-सी नमी और गहरी ख़ामोशी ने घेर लिया।

अमोल ने ज़ोर से आवाज़ लगाई,

"मैनेजर...! कोई है?"

कोई जवाब नहीं आया।

कॉरिडोर की लगभग सभी कमरों पर ताले लगे थे।

सिर्फ़ आख़िरी कमरे का दरवाज़ा बंद था, लेकिन उस पर ताला नहीं था।

उन्होंने फिर आवाज़ दी।

"मैनेजर...!"

फिर भी कोई उत्तर नहीं।

आख़िरकार उन्होंने दरवाज़ा ज़ोर-ज़ोर से खटखटाना शुरू किया।

कुछ ही सेकंड बाद...

चर्ररर...

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

अंदर से लगभग पचास वर्ष का एक केयरटेकर बाहर आया।

उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

उसने बिना कुछ बोले अपने कान की ओर इशारा किया और हाथों से समझाया कि वह बोल और सुन नहीं सकता।

तीनों ने हैरानी से एक-दूसरे को देखा।

केयरटेकर रिसेप्शन पर गया, चाबी वाले बोर्ड से एक चाबी निकाली और उनके हाथ में रख दी।

फिर उसने उँगली ऊपर की ओर उठाई।

मतलब... उनका कमरा पहली मंज़िल पर था।

अमोल ने पूछा,

"नीचे इतने सारे कमरे खाली पड़े हैं। हमें उन्हीं में से कोई कमरा क्यों नहीं दे देते?"

केयरटेकर ने कुछ नहीं कहा।

बस हाथों के इशारों से समझाया कि नीचे वाले कमरे सिंगल और डबल बेड वाले हैं, जबकि ऊपर ट्रिपल बेड वाले कमरे हैं।

उसकी हर हरकत में कुछ अजीब था...

मानो वह कोई बात छिपा रहा हो।

कॉरिडोर का सन्नाटा और भी भारी लगने लगा।

चाबी मिलते ही उन्होंने ड्राइवर से कहा,

"कल सुबह ठीक दस बजे आ जाना।"

ड्राइवर ने एक बार फिर उस इमारत की तरफ़ देखा।

ऐसा लगा जैसे वह कुछ कहना चाहता हो...

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

बस सिर हिलाया, जीप स्टार्ट की और बारिश के बीच धीरे-धीरे वहाँ से चला गया।

कुछ ही पलों में उसकी लाल टेललाइट भी बारिश के परदे में गुम हो गई।

अब उस सुनसान जंगल के बीच...

सिर्फ़ चार लोग थे

तीन मेहमान...

और एक रहस्यमयी केयरटेकर।

अमोल ने इशारों में पूछा,

"खाना कब मिलेगा?"

केयरटेकर ने नौ उँगलियाँ दिखाईं।

मतलब...

रात नौ बजे।

घड़ी में साढ़े सात बज रहे थे।

तीनों ऊपर अपने कमरे में चले गए।

उनके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी।

ऐसा लग रहा था...

मानो गेस्ट हाउस ने उन्हें अपने भीतर तो आने दिया है...

लेकिन अब बाहर निकलना शायद उतना आसान नहीं होगा।

भाग - 3) आधी रात की वह चीख, जिसने सब कुछ बदल दिया..

कमरे में पहुँचकर तीनों ने पहले खुद को थोड़ा तरोताज़ा किया। सफ़र की थकान उतारने के बाद वे आपस में बातें करते रहे। बाहर लगातार बारिश हो रही थी और उसके गिरने की आवाज़ पूरे गेस्ट हाउस में गूँज रही थी।

रात ठीक नौ बजे वे नीचे मेस में खाना खाने पहुँचे।

रसोई में वही केयरटेकर चुपचाप खाना बना रहा था। वहाँ कोई बातचीत नहीं थी। सिर्फ़ बर्तनों की हल्की खनखनाहट, पकते हुए खाने की खुशबू और बाहर बरसते पानी की गड़गड़ाहट पूरे माहौल को और भी रहस्यमय बना रही थी।

कुछ ही देर में वह तीन थालियाँ लेकर आया और एक-एक करके उनके सामने रख दीं।

तीनों ने पहला कौर लिया...

और एक-दूसरे की तरफ़ देखकर मुस्कुरा दिए।

खाना उम्मीद से कहीं ज़्यादा स्वादिष्ट था।

अमोल हँसते हुए बोला,

"इतने वीराने में इतना बढ़िया खाना... इसकी तो बिल्कुल उम्मीद नहीं थी।"

लेकिन केयरटेकर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

वह बस चुपचाप उन्हें देखता रहा।

खाना खत्म होने के बाद तीनों अपने कमरे में लौट आए।

चूँकि केयरटेकर बोल और सुन नहीं सकता था, इसलिए उससे ज़्यादा बातचीत करने का सवाल ही नहीं था।

कमरे में पहुँचकर उन्होंने घरवालों से फ़ोन पर लंबी बातें कीं।

कब एक घंटा बीत गया, उन्हें पता ही नहीं चला।

इस बीच रामेश्वर ने अपना भीगा हुआ हियरिंग एड पंखे के नीचे सूखने के लिए रख दिया।

अमोल को ठंड लग रही थी।

उसने कानों में रूई लगाई और ऊपर से ऊनी टोपी पहन ली।

उधर पंचम ने मोबाइल में डाउनलोड किए हुए गाने चला दिए।

हेडफ़ोन कानों पर लगाए और संगीत सुनते-सुनते कब गहरी नींद में चला गया, उसे खुद भी पता नहीं चला।

रामेश्वर तो पहले से ही सुन नहीं सकता था।

उसने सिर से पाँव तक चादर ओढ़ी और गहरी नींद में सो गया।

दिनभर की कड़ी मेहनत ने तीनों को पूरी तरह थका दिया था।

बाहर बारिश अब भी लगातार हो रही थी...

और उस गेस्ट हाउस में अब एक भी ऐसा इंसान नहीं था...

जो कुछ सुन सकता हो।

धीरे-धीरे रात के बारह बज गए।

पहली मंज़िल की लॉबी में टंगा पुराना बड़ा घड़ीघर अचानक बज उठा।

टन...

टन...

टन...

हर एक घंटा पूरे सुनसान गेस्ट हाउस में गूँज रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे दीवारें, बंद दरवाज़े और लंबा कॉरिडोर भी उस आवाज़ के साथ काँप रहे हों।

बारहवाँ घंटा बजा...

और फिर...

अचानक...

चारों तरफ़ ऐसा सन्नाटा छा गया कि अपनी साँसों की आवाज़ भी सुनाई देने लगी।

एक पल...

दो पल...

और तभी—

आऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ...!!!

एक भयानक...

कानों के पर्दे फाड़ देने वाली...

रूह कंपा देने वाली चीख़ पूरे गेस्ट हाउस में गूँज उठी।

वह आवाज़ इतनी भयावह थी कि मानो किसी इंसान की नहीं, किसी अभिशप्त आत्मा की हो।

उसकी गूँज दीवारों से टकराकर पूरे भवन में फैल गई।

लेकिन...

जिस कमरे में तीनों सो रहे थे...

वहाँ किसी ने भी वह चीख़ नहीं सुनी।

अमोल के कान रूई और टोपी से ढके हुए थे।

"पंचम गहरी नींद में सो चुका था, लेकिन उसके कानों में अब भी हेडफ़ोन लगे थे, जिनमें तेज़ आवाज़ में गाने बज रहे थे।"

रामेश्वर ने हियरिंग एड लगाया ही नहीं था।

तीनों गहरी नींद में डूबे हुए थे।

दिनभर की थकान ने उन्हें ऐसी नींद दी थी कि दुनिया का कोई भी शोर उन्हें जगा नहीं सकता था।

इसलिए...

वह शापित चीख़...

उनके लिए कभी अस्तित्व में आई ही नहीं।

शापित गेस्ट हाउस

भाग -4) अगली सुबह सामने आया ऐसा सच, जिसे सुनकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई

सुबह तक बारिश थम चुकी थी।

हवा में अब भी नमी थी और चारों तरफ़ हल्की ठंडक फैली हुई थी।

तीनों नहा-धोकर नाश्ते के लिए नीचे आए। वे आपस में हँसी-मज़ाक करते हुए मेस की ओर बढ़ रहे थे।

उन्हें हँसते और सामान्य बातें करते देखकर केयरटेकर कुछ पल के लिए बिल्कुल स्तब्ध रह गया।

वह अविश्वास से उन्हें घूरता रहा।

फिर काँपती हुई आवाज़ में बोला,

"त... तुम लोगों को... सुनाई कैसे दे रहा है?"

तीनों एकदम रुक गए।

उनके चेहरों पर भी हैरानी साफ़ दिखाई दे रही थी।

अमोल ने तुरंत पूछा,

"और तुम...? कल तो तुम बोल भी नहीं पा रहे थे और सुन भी नहीं सकते थे। आज अचानक क्या हो गया?"

कुछ पल के लिए वहाँ गहरा सन्नाटा छा गया।

केयरटेकर ने धीमे स्वर में पूछा,

"कल रात... बारह बजे... क्या तुम लोगों ने कोई डरावनी... कान फाड़ देने वाली चीख़ सुनी थी?"

अमोल ने बिना देर किए जवाब दिया,

"बिलकुल नहीं। हम तो आराम से सोए थे।"

फिर उसने हँसते हुए कहा,

"मैंने कानों में रूई डाल रखी थी... पंचम हेडफ़ोन लगाकर सो गया था... और रामेश्वर ने अपना हियरिंग एड लगाया ही नहीं था।"

यह सुनते ही केयरटेकर के चेहरे का रंग उड़ गया।

उसकी आँखों में हैरानी और डर एक साथ उतर आए।

वह कुछ पल तक उन्हें देखता रहा...

फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोला,

"तो... तुम तीनों बच गए..."

उसके यह शब्द सुनते ही तीनों के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

अब तक जो बात उन्हें अंधविश्वास लग रही थी...

वह धीरे-धीरे हकीकत जैसी महसूस होने लगी।

केयरटेकर ने गहरी साँस ली और बोला,

"इस गेस्ट हाउस में हर अमावस्या की रात ठीक बारह बजे एक शापित चीख़ गूँजती है।"

"जो भी उस चीख़ को सुन लेता है... वह हमेशा के लिए गूँगा और बहरा हो जाता है।"

तीनों के चेहरे एकदम सफेद पड़ गए।

कमरे में कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर केयरटेकर ने नज़रें झुका लीं और अपनी कहानी सुनानी शुरू की।

"मैं भी कभी बिल्कुल तुम्हारी तरह था। हँसता था... बोलता था... सुनता था..."

"लेकिन एक अमावस्या की रात मैं भी उस चीख़ का शिकार बन गया। उसी दिन से मेरी ज़िंदगी बदल गई।"

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

"उस रात के बाद मैं न बोल सका... न कुछ सुन सका। लोग मुझे इलाज के लिए घर ले गए। बड़े-बड़े डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।"

  केयरटेकर ने भारी साँस ली।
"आख़िर में एक तांत्रिक ने कहा..."

"अगर इसे फिर से उसी जगह ले जाया जाए, जहाँ यह अभिशप्त चीख़ सुनाई देती है... और यह अकेला वहाँ जाए... तभी इसका श्राप कुछ समय के लिए टूटेगा।"

केयरटेकर ने भारी साँस ली।

"पर उस उपाय की कीमत बहुत बड़ी थी...

उसकी आँखें भर आईं।

"मैं तो वापस बोलने और सुनने लगा... लेकिन मेरी पत्नी और मेरा बेटा... जो मेरी चिंता में मेरे पीछे-पीछे यहाँ आ गए थे..."

वह बोलते-बोलते रुक गया।

कुछ पल बाद उसकी आवाज़ टूट गई।

"उस अभिशप्त चीख़ ने उन्हें नहीं छोड़ा।"

"दोनों हमेशा के लिए गूँगे और बहरे हो गए... और धीरे-धीरे उनकी मानसिक स्थिति भी बिगड़ती चली गई।"

"आज भी वे दोनों... इसी गेस्ट हाउस में... मेरे साथ कैद हैं।"

यह सुनकर तीनों के शरीर में जैसे खून जम गया।

पूरा कमरा फिर से गहरी ख़ामोशी में डूब गया।

कुछ देर बाद केयरटेकर ने उनकी ओर देखा।

उसकी आँखों में एक अजीब-सी विनती थी।

वह बोला,

"यह राज़ मैं सिर्फ़ उन्हीं लोगों को बताता हूँ... जो इस श्राप से बचकर निकल जाते हैं।"

"तुम भी... इस बारे में कभी किसी से मत कहना..."

"वरना... अगला नंबर तुम्हारा भी हो सकता है..."

उसकी आख़िरी बात सुनते ही तीनों के रोंगटे खड़े हो गए।

अब उन्हें सिर्फ़ एक ही बात समझ आ रही थी...

उन्हें जितनी जल्दी हो सके... इस गेस्ट हाउस से निकल जाना चाहिए।

भाग 4) आख़िरी विदाई... और वह डरावना सच जो आज भी ज़िंदा है

केयरटेकर की पूरी बात सुनने के बाद तीनों के चेहरों का रंग उड़ चुका था।

अब उन्हें समझ में आ गया था कि पिछली रात वे संयोग से नहीं, बल्कि किस्मत से बचे थे।

अगर रामेश्वर का हियरिंग एड पानी में न गिरा होता...

अगर अमोल ने ठंड की वजह से कानों में रूई न लगाई होती...

अगर पंचम हेडफ़ोन लगाकर न सोया होता...

तो शायद अगली सुबह उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल चुकी होती।

अमोल ने धीमी आवाज़ में कहा,

"यार... हम सचमुच बहुत बड़े हादसे से बच गए।"

तीनों ने बिना कुछ कहे एक-दूसरे की ओर देखा।

उसी समय बाहर से जीप का हॉर्न सुनाई दिया।

ठीक सुबह के दस बज चुके थे।

तीनों ने बिना एक पल गँवाए अपना सामान उठाया और तेज़ी से बाहर निकल पड़े।

जाते-जाते उनमें से एक ने केयरटेकर के हाथ में दो हज़ार रुपये रख दिए।

केयरटेकर ने पैसे नहीं देखे...

उसने बस तीनों की ओर गहरी नज़र से देखा।

उस नज़र में न खुशी थी...

न दुख...

बस एक अजीब-सी बेबसी थी।

जैसे वह मन ही मन उनके सुरक्षित बच जाने की दुआ कर रहा हो।

तीनों जल्दी-जल्दी जीप में बैठे।

ड्राइवर ने इंजन स्टार्ट किया और गाड़ी धीरे-धीरे गेस्ट हाउस के मुख्य दरवाज़े से बाहर निकलने लगी।

इस बार...

तीनों में से किसी ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उन्हें डर था...

कहीं पीछे देखने पर उन्हें ऐसा कुछ न दिखाई दे जाए...

जिसे वे ज़िंदगी भर भूल न सकें।

कुछ ही पलों में जीप जंगल की सड़क पर दूर निकल गई।

उधर...

गेस्ट हाउस फिर से पहले की तरह शांत हो चुका था।

कॉरिडोर में वही सन्नाटा...

दीवारों पर वही नमी...

और चारों ओर फैली हुई वही अजीब-सी वीरानी।

भूतल की लॉबी में केयरटेकर अकेला खड़ा था।

उसने धीरे-धीरे गेट की ओर देखा...

जहाँ से जीप अब पूरी तरह ओझल हो चुकी थी।

फिर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।

वह बहुत धीमे स्वर में बुदबुदाया,

"तुम लोग बच गए... अब कभी लौटकर मत आना..."

इतना कहकर उसने पीछे मुड़कर देखा।

और तभी...

उसके पीछे बंद पड़े कमरों के भीतर से...

एक-एक करके...

किसी के भारी-भारी साँस लेने की आवाज़ें आने लगीं।

हूँऽऽऽ...

हाऽऽऽ...

हूँऽऽऽ..

आवाज़ें धीरे-धीरे तेज़ होती जा रही थीं।

ऐसा लग रहा था..

मानो उन बंद कमरों में कोई अब भी मौजूद हो...

जो बहुत देर से किसी के आने का इंतज़ार कर रहा था।

क्योंकि...

वे कमरे बंद ज़रूर थे...

लेकिन... खाली कभी नहीं थे।

                                                                                                                                                                                          समाप्त 🖋️📖👻

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‘भरकटलेली शिवाई' - पाकिस्तानी सागरी सीमेत अडकलेल्या भारतीय मच्छीमारांची थरारक मराठी कथा

      'भरकटलेली शिवाई' - पाकिस्तानी सागरी सीमेत अडकलेल्या भारतीय मच्छीमारांची थरारक कहाणी क्षितिजापलीकडे नशिब काळोखात हरवले शिवाईच्या डेकवर स्वप्न सारे कैद झाले | हातात जाळी होती, गुन्हा मात्र ठरला दर्यावर्दी जीवांचा खेळ सीमांनी मांडला | 🔗गोठलेलं काश्मीर' : २०१२ मधील एक अविस्मरणीय सफर आणि जीवघेणा थरार”       माहे  फेब्रुवारी २०१२ मधील आमच्या काश्मीर प्रवासाचा थरारक अनुभव, दल लेक, हाऊसबोट, गुलमर्ग, पहलगाम, गोंडोला राईड, बर्फवृष्टी आणि अफजल गुरु फाशीनंतरचा कर्फ्यू. वाचा एक अविस्मरणीय मराठी प्रवासवर्णन.       ‘भरकटलेली शिवाई’- पाकिस्तानी सागरी सीमेत अडकलेल्या भारतीय मच्छीमारांची मराठी कथा..    पालघरच्या मोपणवारा गावातील “शिवाई” बोट खोल समुद्रात मासेमारीसाठी निघते; पण GPS बंद पडल्याने ती नकळत पाकिस्तानी सागरी हद्दीत पोहोचते. समुद्र, सीमा, कैद आणि मच्छीमारांच्या संघर्षाची हृदयद्रावक आणि थरारक मराठी लघुकथा.        भारतीय मच्छीमारांचे जीवन समुद्राइतकेच अनिश्चित आणि धोकादायक असते. खोल समुद्रात मासेमारी करताना...

"मनाचे श्लोक आणि समर्थांचे अमूल्य उपदेश | रामदास स्वामींचे जीवन बदलणारे विचार आणि ३ प्रेरणादायी कथा

अस्वीकरण .या लेखातील माहिती ही ऐकीव तसेच वेळोवेळी  वाचनात   आलेल्या माहितीवर आधारित आहेत. तर  या लेखातील तीन कथा या पूर्णपणे काल्पनिक असून केवळ मनोरंजनासाठी लिहिलेल्या आहेत. यांचा वास्तविक व्यक्ती, घटना किंवा ठिकाणाशी संबंध असणे हा निव्वळ योगायोग आहे                 " मनाचे श्लोक आणि समर्थांचे अमूल्य उपदेश |  रामदास स्वामींचे जीवन बदलणारे विचार आणि  ३  प्रेरणादायी  कथा" “सकळांशी शहाणे करूनि सोडावे । आपुले कार्य साधूनि घ्यावे ॥”    (सर्वांशी शहाणपणाने, समजूतदारपणे वागावे पण त्याच वेळी स्वतःचे उद्दिष्टही पूर्ण करावे )    🔗   'गद्धेगळ ' - एक ऐतिहासिक वारसा | गद्धेगळ म्हणजे काय? इतिहास, अर्थ आणि महत्त्व..       मागील कथा ही लघु लेख आहे  म्हणजे काय आणि त्याचा इतिहास काय आहे? महाराष्ट्रातील मध्ययुगीन काळातील या शाप-शिळांची माहिती, त्यावरील गाढव आणि स्त्रीची आकृती यामागील अर्थ, तसेच त्यांचे ऐतिहासिक महत्त्व सविस्तर जाणून घ्या.      ' मनाचे श्लोक आणि समर्थ...

चकवा - मनाचा की मार्गाचा ? जीवनातील गोंधळ आणि योग्य दिशा कशी ठरवावी ?

'चकवा '- मनाचा की मार्गाचा ?  जीवनातील गोंधळ आणि योग्य दिशा कशी ठरवावी ? 🔗 "दुर्वांची जुडी | गणपतीला दुर्वा का अर्पण करतात? परंपरा, श्रद्धा आणि भावनिक मराठी कथा "      तुम्ही कधी विचार केला आहे का, एक साधीशी दिसणारी दुर्वाची जुडी…  खरंच इतकी शक्तिशाली असू शकते? याची प्रचिती मागील लघु कथेतून येईल तुम्हाला कधी असा अनुभव आला आहे का?  ज्यात आपण योग्य मार्गावर आहोत असे वाटते, पण प्रत्यक्षात आपण चुकतो. चकवा फक्त ग्रामीण भागातच बसतो असे नाही, तो शहरातही तितक्याच सहजपणे बसू शकतो. अपुर्‍या माहितीमुळे किंवा चुकीच्या अंदाजामुळे माणूस गोंधळात पडतो.या गोंधळातून शांतपणे योग्य मार्ग कसा शोधावा, यावर हा लेख आहे.       चकवा - मनाचा की मार्गाचा ? जीवनातील गोंधळ आणि योग्य दिशा कशी ठरवावी ?  चकवा ही गोंधळलेल्या मनाची स्थिती, कधी तरी येते माणसांच्या  मार्ग भ्रमंती। अपुरी माहिती ,भ्रम हीच तिची खरी कारणे, जीवनात सामान्य असते चकवा लागणे।  म्हणून सोडू नका,त्या मार्गी जाणे॥ चकवा म्हणजे काय?      'चकवा' म्हणजे केवळ रस्ता चुकणे नाही, ...